पुष्टिमार्ग में गृहसेवा Pushtimarg Gruh Seva | How to do Gruh Seva | घर सेवा पुष्टिमार्ग अपने निज घर में सेवा ही सच्चा पुष्टिमार्ग है
१. प्रस्तावना: शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद और सेवा-भक्ति का स्वरूप
भारतीय दर्शन के इतिहास में श्रीमद् वल्लभाचार्यजी (श्री महाप्रभुजी) द्वारा प्रवर्तित पुष्टिभक्तिमार्ग (शुद्धाद्वैत ब्रह्मवाद) एक क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में उभरा है। हमारे संप्रदाय का मुख्य उद्देश्य जीव को भगवान श्रीकृष्ण के साथ निर्गुण, प्रेमलक्षणा भक्ति के माध्यम से पुन: जोड़ना है। पुष्टिमार्ग के हृदय के समान 'सेवा' केवल एक क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीव का ब्रह्म के साथ अनुसंधान है। वर्तमान समय में, पुष्टिमार्गीय अनुयायियों में 'गृह सेवा' (स्वयं के घर में सेवा) और 'हवेली सेवा' (सार्वजनिक मंदिरों में सेवा/दर्शन) के बीच के अंतर और महत्व के बारे में कई गलतफहमियां प्रचलित हैं। इस शोध रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य श्रीमहाप्रभुजी द्वारा रचित "षोडश ग्रंथ" और उन पर आधारित टीका-ग्रंथों के आधार पर यह सिद्ध करना है कि पुष्टिमार्ग में 'गृह सेवा' ही एकमात्र शास्त्रसम्मत और फलदायी रीति है, जबकि वर्तमान 'हवेली परंपरा' और सार्वजनिक मंदिरों की पद्धति मूल सिद्धांतों के विपरीत अपसिद्धांत और कई मायनों में बाधक है।
इस रिपोर्ट में श्रीमहाप्रभुजी के मूलभूत ग्रंथों जैसे कि सिद्धांत मुक्तावली, भक्तिवर्धिनी, संन्यास निर्णय, सिद्धांत रहस्य, जलभेद और सेवा फलम् का गहराई से विश्लेषण किया गया है। हम देखेंगे कि कैसे 'तनुवित्तजा सेवा', 'असमर्पित त्याग', 'देवद्रव्य निषेध' और 'नान्यत्र गमन' जैसे बुनियादी सिद्धांत सार्वजनिक पूजा पद्धति को नकारते हैं और 'निज मंदिर' (स्वगृह) की भावना को अनिवार्य बनाते हैं।
१.१ पुष्टिमार्ग की परिभाषा और सेवा के लक्षण
पुष्टिमार्ग अर्थात भगवान के अनुग्रह (कृपा) का मार्ग। “पुष्टि प्रवाह मर्यादा” भेद ग्रंथ में श्री महाप्रभुजी स्पष्ट करते हैं कि, पुष्टि जीव सृष्टि के प्रवाह या वेद की मर्यादा से परे हैं; उनका (पुष्टि जीव का) सृजन ही भगवान की सेवा के लिए हुआ है। यहाँ 'सेवा' शब्द का अर्थ केवल मूर्तिपूजा नहीं है। सिद्धांत मुक्तावली में सेवा की परिभाषा देते हुए आचार्यचरण कहते हैं: "चेतस्तत्प्रवणं सेवा" - अर्थात चित्त का भगवान में प्रवण (पूरी तरह से तल्लीन) होना ही सेवा है। इस मानसिक अवस्था को प्राप्त करने के लिए शारीरिक श्रम और अपने धन का समर्पण ही साधन है। यह परिभाषा ही संकेत देती है कि जब तक चित्त की एकाग्रता सिद्ध न हो तब तक सेवा सिद्ध नहीं होती, और सार्वजनिक स्थानों पर चित्त की एकाग्रता बनाए रखना असंभव है, जैसा कि हम आगे देखेंगे।
२. सिद्धांत मुक्तावली: तनु-वित्तजा सेवा और स्व-धर्म का महत्व
श्रीमहाप्रभुजी ने “सिद्धांत मुक्तावली” ग्रंथ में, सेवा के किन्हीं दो मुख्य प्रकारों का वर्णन नहीं किया है, बल्कि एक संयुक्त स्वरूप दिया है: 'तनुवित्तजा'। इस शब्द के अर्थ और गूढ़ार्थ को समझना गृह सेवा के समर्थन के लिए आधारभूत है।
२.१ 'तनुवित्तजा' का अर्थ और अनिवार्यता
श्लोक: "चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत् सिद्धयै तनुवित्तजा"। यहाँ 'तनु' (शरीर) और 'वित्त' (धन) - इन दोनों के संयोजन से होने वाली सेवा की बात है। आचार्यचरणों ने 'तनुजा' (शरीर से होने वाली) और 'वित्तजा' (धन से होने वाली) सेवा को अलग-अलग नहीं माना है, बल्कि एक समास के रूप में 'तनुवित्तजा' शब्द का प्रयोग किया है। इसका अर्थ यह है कि सेवक को अपने ही शरीर से और अपने ही कमाए हुए धन से प्रभु की सेवा करना अनिवार्य है। और यही श्री महाप्रभुजी और श्री गुसांईजी के पुष्टिमार्ग की रीति है।
सिद्धान्तमुक्तावली:
श्रीमद्विट्ठलेश्वरविरचित विवृतिसमेता
तमेवाहुः कृष्णसेवेति । फलात्मकनामोक्त्या स्वतः पुरुषार्थत्वेन सेवाकृतिः स्वसिद्धान्तो, न त्वन्यशेषत्वेनेति ज्ञाप्यते । सेवा हि सेवकधर्मः । तदुक्त्या जीवानामशेषाणां सहजदासत्वं ज्ञापितम् । अत एव न कर्मणीवात्र 'कालपरिच्छेदोस्तीत्याहः सदेति । आवश्यकार्थण्यत्प्रत्ययान्तकार्यपदोक्त्या तदकरणे प्रत्यवायी भवतीति भावो ज्ञाप्यते ।
अर्थ: फलात्मक कृष्ण की सेवा स्वतः (अपनी ओर से/स्वयं) पुरुषार्थ स्वरूप समझकर करनी चाहिए, साधन समझकर नहीं। यही हमारे मार्ग का सिद्धांत है। कृष्ण सेवा ही फल स्वरूप है, उससे कुछ और प्राप्त नहीं करना है। सहज दास होने के कारण श्रीकृष्ण सेवा करना आवश्यक है, यदि यह नहीं करेंगे तो दोष लगेगा।
सा च फलरूपा साधनरूपा चास्ते । तत्र मानसी सा परा फलरूपेत्यर्थः । यथा व्रजसीमन्तिनीनाम् ।
अर्थ: कृष्ण सेवा फलरूपा और साधनरूपा दोनों प्रकार की है। इनमें मानसी सेवा फलरूपा है।
(व्रजगोपिकाओं के प्राणनाथ श्रीकृष्ण ने "हे उद्धव! जिस प्रकार बड़े-बड़े ऋषि-मुनि समाधि में तल्लीन हो जाते हैं और जैसे बड़ी-बड़ी नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना नाम और रूप खो देती हैं, वैसे ही गोपियाँ मुझमें इतनी तन्मय हो गई थीं कि उन्हें लोक-परलोक, शरीर और अपने कहे जाने वाले पति-पुत्रादि की भी सुध-बुध नहीं रही थी (श्रीमद् भागवत-११/१२/१२)" इत्यादि वाक्यों द्वारा कहा भी है।)
सिद्धान्तमुक्तावली:
श्रीमद्रोकुलनाथजीकृत विवृतिटिप्पणी
सर्वात्मभावस्य मनोधर्मत्वात्तत्पूर्विकायास्तस्या मानसीत्वमुक्तमिति न काचित्क्षतिः।
अर्थ: सर्वात्मभाव का उदय होना मन का धर्म है, अर्थात सर्वात्मभाव मन में प्रकट होता है। इसलिए व्रजसीमंतिनियों (व्रज की गोपियों) द्वारा अपने मन को भगवान में पूर्णतः जोड़कर भगवान की सेवा करने को श्री प्रभुचरणों ने 'मानसी सेवा' कहा है।
सिद्धान्तमुक्तावली
श्रीमत्पुरुषोत्तमजीकृत विवृतिप्रकाशः
अतः कृष्ण इति फलात्मकस्य भगवतो नाम, तदुक्त्या तत्समभिव्याहारेण तथा सेवाकृतिः स्वसिद्धान्तः।
अर्थ: फलात्मक कृष्ण की सेवा को भी फलात्मक (फल स्वरूप) ही समझकर उनकी सेवा करना ही हमारे मार्ग का सिद्धांत है।
१. अभिमान का उद्भव: यदि मैं केवल पैसा दूँ और सेवा न करूँ, तो मुझमें "मैंने सेवा करवाई" या “मैं आज के ५६ भोग का मनोरथी हूँ” जैसा राजसी अभिमान आएगा।
२. चित्त विनियोग का अभाव: सेवा का उद्देश्य चित्त को भगवान में जोड़ना है। जब मैं स्वयं श्रम करता हूँ (भोग सिद्ध करना, श्रृंगार करना, सोहनी करना), तब मेरा मन उस क्रिया के साथ भगवान में जुड़ा रहता है। यदि मैं केवल पैसे दे दूँ, तो मेरा मन भगवान में नहीं, बल्कि मेरे पैसों के संसार में ही भटकता रहेगा।
अतः, 'तनुवित्तजा' सिद्धांत का निष्कर्ष यही निकलता है कि सेवा ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ मेरा (पुष्टिमार्गीय वैष्णव का) अपना तन और मेरा (पुष्टिमार्गीय वैष्णव का) अपना धन उपयोग में आता हो। यह शर्त केवल और केवल 'गृह सेवा' में ही पूर्ण होती है। हवेली में वैष्णव का धन होता है और तन (सेवा करने वाला) किसी और का होता है, एवं व्यवस्था और स्वामित्व भी दूसरों का होता है। इसलिए, "हवेली सेवा" महाप्रभुजी की दृष्टि में उपर्युक्त अनुसार 'तनुवित्तजा' सेवा नहीं है।
जब वैष्णव अपने घर में निरंतर प्रभु की सेवा में लगा रहता है, तब उसके संस्कार इतने दृढ़ हो जाते हैं कि, जब वह शारीरिक रूप से सेवा नहीं कर रहा होता, तब भी उसका मन प्रभु की लीला में ही रमण करता है। यह अवस्था सार्वजनिक दर्शन से प्राप्त नहीं होती। सार्वजनिक मंदिर (हवेली) में जीव (वैष्णव) 'प्रेक्षक' (Viewer) होता है, जबकि गृह सेवा में जीव 'कर्ता' (Doer) और 'भोक्ता' (Enjoyer) होता है। मानसी सेवा सिद्ध करने के लिए सोपान गृह सेवा ही है, जिसमें बाहरी विक्षेप न्यूनतम होते हैं।
३. हवेली परंपरा : 'देवद्रव्य' और 'सार्वजनिकता' के जोखिम
इस रिपोर्ट का यह खंड (बिंदु २ और ३) श्रीमहाप्रभुजी के सिद्धांतों की कसौटी पर वर्तमान हवेली परंपरा का मूल्यांकन करता है। ऐतिहासिक रूप से, श्रीमहाप्रभुजी और श्रीगुसांईजी के समय में 'हवेली' शब्द का अर्थ 'बड़ा घर' (Mansion) होता था, जहाँ गोस्वामी बालक अपने सेव्य स्वरूप की सेवा करते थे। वे सार्वजनिक मंदिर नहीं थे। परंतु समय के साथ यह व्यवस्था बदल गई और आज हवेलियाँ 'पब्लिक ट्रस्ट' संचालित मंदिर बन गई हैं, जो कई दोषों का कारण बना है।
३.१ देवद्रव्य का निषेध
पुष्टिमार्ग में 'देवद्रव्य' (भगवान के नाम पर आया धन) का उपयोग करना महापाप माना गया है। श्रीमहाप्रभुजी ने "घरु वार्ता" में स्पष्ट आज्ञा दी है: "जो श्रीठाकुरजी का (देव) द्रव्य खाएगा वह मेरा (पुष्टिमार्गी) नहीं कहलाएगा। और मेरा सेवक भगवदीय होगा वह देवद्रव्य कभी नहीं खाएगा"।
सार्वजनिक हवेलियों में होने वाले मनोरथ, भोग-सामग्री, श्रृंगार और उत्सव वैष्णवों द्वारा दी जाने वाली भेंट-सौगात और नकद राशि (Dev Dravya) द्वारा ही संभव होते हैं। यहाँ, गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं:
भोग अंगीकार का प्रश्न: श्रीठाकुरजी केवल 'स्वकीय' (अपने भक्त की) सामग्री ही अंगीकार करते हैं। हवेली में मुखियाजी जो भोग धरते हैं, वह सामग्री मुखियाजी के स्वद्रव्य की नहीं होती, वह समाज (वैष्णव) के पैसों की होती है। किशोरीबाई के प्रसंग में श्रीठाकुरजी ने स्पष्ट कहा था कि "तूने मेरे लिए (दूसरों से) सामग्री क्यों ली? वह हम कैसे आरोग्यें?"। इस सिद्धांत (वार्ता) के अनुसार, दूसरों के द्रव्य से होने वाली हवेली की सेवा प्रभु अंगीकार करते ही नहीं हैं।
प्रसाद की अशुद्धि: जब भोग ही अंगीकार नहीं होता, तब वह प्रसाद नहीं रहता, केवल अन्न रह जाता है। साथ ही, वह अन्न देवद्रव्य से खरीदा गया होने के कारण उसे आरोगना पुष्टिमार्गीय जीव के लिए बाधक है। श्रीपुरुषोत्तमजी महाराज सिद्धांत रहस्य की टीका में समझाते हैं कि असमर्पित वस्तु का त्याग करना चाहिए, और देवद्रव्य से खरीदी गई वस्तु प्रभु को समर्पित नहीं होती (क्योंकि समर्पण करने वाले का उस पर स्वामित्व होना चाहिए)।
व्यापारीकरण: आज की हवेलियों में मनोरथों के 'भाव' (Rates) निर्धारित होते हैं। पैसे देकर मनोरथ कराना सेवा नहीं, बल्कि व्यापार है। श्रीमहाप्रभुजी ने कभी सेवा का आर्थिक विनिमय स्वीकार नहीं किया। जलभेद ग्रंथ में आचार्यश्री ने स्पष्ट कहा है कि जो लोग गान (कीर्तन) या कथा को आजीविका का साधन बनाते हैं वे 'गर्त' (गड्ढे के गंदे पानी) के समान हैं।
३.२ देवलक: वेतनभोगी मुखियाजी प्रथा
श्रीमहाप्रभुजी द्वारा ("मेरा सेवक भगवदीय होगा, वह देवद्रव्य कभी नहीं खाएगा" घरु वार्ता में आपकी आज्ञा) 'देवलक' की कड़ी निंदा की गई है।
श्लोक: "देवारर्चनपरो यस्तु वित्तार्थी वत्सरत्रयम्| स वै देवलको नाम हव्य-कव्येषु गर्हितः"। (देवल स्मृति)
अर्थात, जो व्यक्ति तीन वर्ष तक धन की इच्छा से देवपूजा करता है, वह 'देवलक' कहलाता है और वह सभी धार्मिक कार्यों के लिए अयोग्य माना जाता है। (देवल स्मृति)
हवेलियों में सेवा करने वाले मुखियाजी और कर्मचारी वेतनभोगी होते हैं। वे सेवा (कथित रूप से) भले ही करें, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य आजीविका (वित्त) होता है। श्रीमहाप्रभुजी के अनुसार, ऐसे देवलक के हाथ से हुई सेवा प्रभु स्वीकार नहीं करते और ऐसे पुजारी के दर्शन भी पापरूप माने गए हैं। गृह सेवा में सेवक वेतन नहीं लेता; इसके विपरीत वह अपना धन प्रभु के लिए खर्च करता है। इसलिए, गृह सेवा में 'देवलक' दोष नहीं लगता और सेवा शुद्ध रहती है।
सिद्धान्तमुक्तावली
श्रीमत्पुरुषोत्तमजीकृत विवृतिप्रकाशः
तच्चेद्वित्तं वेतनत्वेन दत्त्वा कार्यते, तदा सा चित्तस्य राजसत्वं कुर्वन्ती चित्तस्य तत्प्रवणत्वं न करोति । यदि च वित्तं वेतनत्वेन गृहीत्वा क्रियते, तदा ऋत्विजो यागवत् स्वस्य तत्प्रवणत्वरूपं फलं न साधयति । न च यागो यजमानस्येव वित्तदातुः फलतीति शंक्यम् । तत्रत्र्विग्दक्षिणावरणादिवदत्र तहानादेर्भक्तिमार्गे भगवतानुक्तत्वात् । अतस्तथा न कार्यम्, किन्तु भगवदुक्तरीत्यैव कार्यम् । तदैव साधनरूपा साध्यरूपां मानर्सी सेवां जनयन्ती स्वयमपि पश्चात्फलरूपतया व्रजस्थानामिव पर्यवस्यतीति । एतदेव निबन्धे 'विशिष्टरूपं वेदार्थ' इत्यादिना 'एतन्मार्गद्वयं प्रोक्त' मित्यन्तेन सविवरणेन बोधितम् ।
अर्थ: परंतु यदि सेवा धन वेतन के रूप में (सैलरी के तौर पर) देकर किसी अन्य से कराई जाए, तो ऐसी सेवा चित्त में राजसता पैदा करती है और चित्त को प्रभु में प्रवण (तल्लीन) नहीं करती। ठीक इसी प्रकार, यदि कोई धन को वेतन के रूप में स्वीकार करके सेवा करता है, तो जैसे यज्ञकर्ता (यज्ञ करने वाले) को यज्ञ फल नहीं मिलता बल्कि यजमान (यज्ञ कराने वाले) को ही फल मिलता है, वैसे ही ऐसी सेवा वेतन के रूप में धन लेकर करने वाले के चित्त को भगवान में लगाने वाले फल को सिद्ध नहीं करती।
यहाँ आप ऐसा न सोच लें कि, फिर जिस प्रकार यज्ञ का फल यजमान को मिलता है, उस प्रकार धन देकर सेवा कराने वाले को भी सेवा का फल प्राप्त हो जाएगा... नहीं, यह तर्क भगवद्सेवा के लिए लागू नहीं होता क्योंकि जिस प्रकार यज्ञ के संदर्भ में यजमान द्वारा ऋत्विजों का चयन करके तत्पश्चात उनसे यज्ञ कराके, उन्हें दक्षिणा देकर यज्ञफल स्वयं प्राप्त करने की बात कही गई है, उस प्रकार धन देकर या दक्षिणा आदि देकर भगवद्सेवा कराके फल स्वयं प्राप्त कर लेने का प्रकार भगवान ने भक्तिमार्ग में कहीं भी नहीं कहा है।
इस कारण धन देकर या धन लेकर वेतन के रूप में किसी से भगवद्सेवा नहीं करनी/करानी चाहिए, बल्कि स्वयं भगवान ने एकादश स्कंध में जिस प्रकार कहा है, उसी रीति से सेवा करनी चाहिए। भगवदुक्त साधन सेवा ही साध्यरूपा मानसी सेवा को उत्पन्न करती है और कालांतर में स्वयं वह भी फलरूपा बन जाती है, जैसी व्रजभक्तों की सेवा थी। यही बात आचार्यचरणों ने निबंध में 'विशिष्टरूपं वेदार्थः (सर्व-२२०)' इत्यादि वाक्यों से लेकर 'एतन्मार्गद्वयं प्रोक्तं-२५६' यहाँ तक के वाक्यों द्वारा विवरण सहित समझाई है।
३.३ सार्वजनिकता और भक्ति का विनाश
बीजदाઢર્ય પ્રકારસ્તુ, ગૃહે સ્થિત્વા સ્વધર્મતઃ । અવ્યાવૃત્તો ભજેત્ કૃષ્ણ, પૂજ્યા શ્રવણાદિભિઃ ।।૨।।
बीजदार्ढ्य = बीजभाव दृढ़ करने का, प्रकार: तु = प्रकार तो (ऐसा है कि), गृहे = (अपने) घर में, स्थित्वा = रहकर, स्वधर्मतः = स्वधर्म के अनुसार, अव्यावृत्तो = व्यावृत्ति किए बिना, भजेत् = सेवा करना, कृष्णम् = भगवान श्रीकृष्ण की, पूज्या = पूजा द्वारा, श्रवण-आदिभिः = श्रवण आदि से
भावार्थ:- भक्ति का बीजभाव दृढ़ करने का प्रकार तो ऐसा है कि किसी भी प्रकार की व्यावृत्ति के बिना अर्थात व्यवसाय, धंधा, अन्य उद्यम से निवृत्तिपूर्वक संगरहित होकर अपने घर में रहकर, स्वधर्म के अनुसार पूजन और श्रवण आदि से भगवान श्रीकृष्ण की सेवा करना।
सार्वजनिक स्थानों पर भीड़, शोर-शराबा और विभिन्न प्रकार के लोगों का संपर्क भक्तिभाव का नाश करता है। हवेलियों में होने वाले दर्शन में कई बार भक्ति की तुलना में धक्का-मुक्की और प्रबंधन का अनुभव अधिक होता है। वहाँ 'दर्शन' एक सामाजिक प्रसंग बन जाता है, जबकि गृह सेवा एक आत्मीय मिलन है।
श्रीमहाप्रभुजी ने निरोधलक्षण में गोपियों के विरह और प्रेम की जो स्थिति वर्णित की है, वह अत्यंत गोपनीय है। गोपियों का प्रेम प्रदर्शन का विषय नहीं था। जबकि हवेली में होने वाले उत्सव और मनोरथ अक्सर प्रदर्शन और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए होते हैं। "मेरा मनोरथ" ऐसा अभिमान सेवक (मनोरथी) में आता है, जो भक्तिमार्ग में सबसे बड़ा बाधक है।
| विषय | गृह सेवा (पुष्टिमार्गीय सिद्धांत) | हवेली सेवा (वर्तमान कुपरंपरा) |
|---|---|---|
| द्रव्य स्रोत | स्व-द्रव्य (सेवक का स्वयं का कमाया हुआ) | देवद्रव्य (समाज की भेंट/दान) |
| सेवक | स्वयं (तनुजा) | वेतनभोगी मुखियाजी/कर्मचारी |
| भाव | नंदालय (वैष्णव का घर), वात्सल्य | देवालय (मंदिर) |
| उद्देश्य | भगवद् संतोष | आत्म संतोष / सामाजिक प्रतिष्ठा |
| स्वरूप | निजसेव्य (पुष्टि पुरुषोत्तम) | प्रभु का स्वरूप तिरोहित होता है |
४. गृह सेवा : षोडश ग्रंथों का आदेश
श्रीमहाप्रभुजी ने षोडश ग्रंथों में कदम-कदम पर गृह सेवा की महिमा गाई है और इसे ही कलियुग में जीव के उद्धार का एकमात्र उपाय बताया है।
४.१ भक्तिवर्धिनी: "गृहे स्थित्वा" - घर ही आश्रम है
“भक्तिवर्धिनी” ग्रंथ के द्वितीय श्लोक में महाप्रभुजी स्पष्ट आज्ञा देते हैं:"बीजदार्ढ्य प्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः | अव्यावृત્તો भजेत् कृष्ण पूजया श्रवणदिभिः ||"। यहाँ "गृहे स्थित्वा" (घर में रहकर) शब्द अत्यंत एकांत का सूचक है। भक्ति का बीज दृढ़ करने के लिए सेवक को घर छोड़कर वन में या मंदिर (हवेली) में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। घर ही सच्चा आश्रम है जहाँ सेवक अपने प्रभु के साथ किसी भी प्रकार के बाहरी विक्षेप के बिना रह सकता है। "अव्यावृत्त" शब्द का अर्थ है व्यावृत्ति रहित, यानी चित्त अन्यत्र नहीं भटकना चाहिए। यदि सेवक दर्शन के लिए यहाँ-वहाँ भटकेगा, तो उसका चित्त स्थिर नहीं होगा। घर में ही प्रभु विराजमान हों, तो चित्त को अन्यत्र जाने का कारण नहीं रहता। इस गृह सेवा द्वारा ही स्नेह, आसक्ति और व्यसन - भक्ति की इन तीन उच्च अवस्थाओं को प्राप्त किया जा सकता है।
४.२ संन्यास निर्णय: कलियुग में त्याग का निषेध और घर की रक्षा
संन्यास निर्णय ग्रंथ में श्रीमहाप्रभुजी ने कलियुग में पारंपरिक संन्यास का निषेध किया है। श्लोक: "अतः कलौ स संन्यासः पश्चात्तापाय नान्यथा| पाषंडित्वं भवेच्चापि तस्माज्ञाने न संन्यसेत्||"। कलियुग में ज्ञानमार्गीय या कर्ममार्गीय संन्यास लेने से केवल पश्चाताप और पाखंड ही हाथ लगता है। इसलिए, भक्त को घर का त्याग नहीं करना चाहिए। पुष्टिमार्गीय संन्यास केवल 'विरहानुभव' ही है, जो अत्यंत उच्च श्रेणी के भक्त के लिए है। सामान्य जीव के लिए तो "त्यागे बाधक भूयत्वं" - त्याग में कई बाधक हैं (जैसे भोजन की चिंता, दुसंग आदि)। इसलिए, सबसे सुरक्षित मार्ग यह है कि घर में ही रहकर, प्रभु को सर्वस्व समर्पण कर, गृहस्थ जीवन को 'सेवामय' बना देना।
४.३ सिद्धांत रहस्य: असमर्पित त्याग और नंदालय भाव
सिद्धांत रहस्य ग्रंथ में ब्रह्मसंबंध मंत्र द्वारा 'निवेदन' का सिद्धांत समझाया गया है। श्लोक: "असमર્પિત वस्तूनों तस्माद् वर्जनमाचरेत्"। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रभु को समर्पित किए बिना किसी भी वस्तु का उपयोग करना वर्जित है। इस नियम का पालन व्यावहारिक रूप से केवल और केवल 'गृह सेवा' में ही संभव है।
सिद्धान्त-रहस्यम् श्रीगोकुलनाथानां पुरुषोत्तमसिद्धान्त विवृतिः
असमर्पितवस्तूनां तस्माद्वर्जनमाचरेत् ।। ४ ।। एवं सेवार्थं सोपपत्तिकां सर्वदोषनिवृत्तिमुक्त्वाग्रे तादृशस्य यावज्जीचं दोषसंक्रान्त्यभावार्थ स्थितिप्रकारमाहुः असर्पितवस्तूनामिति । यतोस्मिन्मार्गे भगवत्सम्बन्धाभाववद्वस्तुसंसर्गस्यैव दोषत्यम्, अतः स्वार्थं भगवदसमर्पितवस्तूनां वर्जनमाचरेत्। संसर्गमपि न कुर्यादित्यर्थः।
अर्थ: इस प्रकार सेवा के लिए प्रमाण सहित समस्त दोषों की निवृत्ति कहकर, आगे उस व्यक्ति को जीवन पर्यंत दोष-संक्रमण के अभाव के लिए (दोष न लगे इसके लिए) रहने का प्रकार 'असमर्पित वस्तूनाम्' - इन शब्दों से कह रहे हैं। क्योंकि इस मार्ग में भगवद्-संबंध के अभाव जैसी वस्तु के संसर्ग से ही दोष उत्पन्न होता है, इसलिए स्वयं भगवद् असमर्पित वस्तुओं का वर्जन (त्याग) करना चाहिए। उसका संसर्ग भी नहीं करना चाहिए, ऐसा इसका अर्थ है।
जब प्रभु घर में विराजमान होते हैं, तब भोग बनने के तुरंत बाद धराया जा सकता है, पानी पीने से पहले समर्पित किया जा सकता है, इस तरह पूरी जीवनचर्या 'सेवा' बन जाती है। हवेली में जाकर आने वाले व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है। वह अपने घर में असमर्पित अन्न-जल लेता है, जो दोषपूर्ण है। ब्रह्मसंबंध में सेवक प्रतिज्ञा लेता है कि "मैं अपने देह, प्राण, इंद्रियाँ, अंतःकरण, घर, पत्नी, पुत्र, धन... सब कुछ श्रीकृष्ण को समर्पण करता हूँ"। यह समर्पण तभी सच्चा सिद्ध होता है जब इन सभी वस्तुओं का विनियोग प्रभु की सेवा में हो। इसके लिए घर को 'नंदालय' बनाना ही पड़ता है।
४.४ निरोधलक्षण: प्रपंच विस्मृति और भगवदासक्ति
निरोधलक्षण ग्रंथ का मुख्य विषय है प्रपंच (संसार) की विस्मृति और भगवान में आसक्ति। श्रीमहाप्रभुजी श्री यशोदाजी और गोपियों के उदाहरण द्वारा समझाते हैं कि सच्चा निरोध घर में रहकर भी हो सकता है, यदि घर के सभी कार्य कृष्ण संबंधित हों। श्लोक: "यच्च दुःखं यशोदाया नंदादीनां च गोकुले..." पुष्टिमार्गीय जीव को अपने घर को ही गोकुल बनाना है। हवेली में जाने से क्षणिक आवेश आ सकता है, लेकिन वह स्थायी 'निरोध' नहीं है। स्थायी निरोध के लिए तो प्रभु के साथ निरंतर, अविरत अनुसंधान चाहिए, जो गृह सेवा द्वारा ही संभव है।
५.ऐतिहासिक संदर्भ और महाप्रभुजी का दृष्टिकोण
श्रीनाथजी का मंदिर (एक मात्र पुष्टिमार्गीय देवालय अपवादस्वरूप)गोवर्धन पर श्रीनाथजी का मंदिर एक अपवाद था और वह स्वयं प्रकट स्वरूप था। महाप्रभुजी ने वहाँ भी 'सेवा' प्रणाली स्थापित की थी, 'पूजा' नहीं। और उस समय भी वहाँ सार्वजनिक मेले या पैसे उगाहने की प्रथा नहीं थी। हवेलियों का उद्भव: प्राचीन समय में जब मुगल आक्रमण बढ़े और सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हुआ, तब स्वरूपों को सुरक्षित रखने के लिए हवेली जैसी संरचनाएँ (जो बाहर से घर जैसी लगें) अस्तित्व में आईं। परंतु इसका मूल उद्देश्य गोस्वामीजी का निवास स्थान और उनकी व्यक्तिगत सेवा ही था। समय के साथ यह व्यवस्था बदल गई और पब्लिक ट्रस्ट बन गई।
६. निष्कर्ष: गृह सेवा ही सत्य है
षोडश ग्रंथों, श्रीमहाप्रभुजी के उपदेशों से निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचा जा सकता है:
१. सैद्धांतिक अनिवार्यता: 'तनुवित्तजा' सेवा, जो पुष्टिमार्ग की आधारशिला है, वह केवल और केवल स्वगृह में ही सिद्ध हो सकती है। हवेली एक दुकान हो सकती है, लेकिन वह 'तनुवित्तजा' सेवा नहीं है।
अतः, पुष्टिमार्ग में 'गृह सेवा' का कोई विकल्प नहीं है, बल्कि वही सिद्धांत और मार्गीय रीति है। जो वैष्णव, अपने घर में विराजित ठाकुरजी की यथाशक्ति, प्रेमपूर्वक और अपने ही तन और अपने धन से सेवा करता है, वही सच्चा पुष्टिमार्गीय वैष्णव है, वही प्रभु की प्रसन्नता (भगवद् संतोष) प्राप्त कर सकता है। "कृष्ण सेवा सदा कार्या" का सही अर्थ अपने हृदय और अपने घर में कृष्ण को स्थापित कर, जीवन का प्रत्येक क्षण उन्हें समर्पित करना ही है।
७.हवेली सेवा अपसैद्धांतिक क्यों?
मार्गीय दृष्टि से हवेली सेवा पुष्टिमार्गीय सिद्धांत नहीं है (अपसिद्धांत है)। इसके कारण निम्नलिखित हैं:
अन्याश्रय का भय: श्री महाप्रभुजी ने 'विवेकधैर्याश्रय' ग्रंथ में अन्याश्रय का निषेध किया है। यदि वैष्णव अपने घर में विराजित ठाकुरजी को समय देने के बजाय, मान-प्रतिष्ठा या देखा-देखी के कारण हवेली की गतिविधियों में लगा रहे, तो वह अपने ठाकुरजी का द्रोह करता है। अपने सेव्य को छोड़कर अन्यत्र मन लगाना एक प्रकार का अन्याश्रय ही है।
लौकिक प्रदर्शन: हवेली सेवा अक्सर सामाजिक मेल-मिलाप या उत्सव तक ही सीमित हो जाती है, जिसमें भक्ति की तुलना में व्यवस्था और प्रदर्शन का तत्व बढ़ जाता है। पुष्टिमार्ग 'निर्गुण' है, जबकि ऐसी सार्वजनिक सेवाओं में 'सगुण' (लौकिक) भाव आने की संभावना रहती है।
अतः, सिद्धांत स्पष्ट है: "निज गृह में निज सेव्य की ही सेवा" (अपने घर पर ही सेवा करना)। सेवा तो केवल और केवल 'निज गृह' (अपने घर) में ही सिद्धांतसम्मत और पुष्टिमार्गीय रीति के अनुसार है।